इथरल : कब, कितना और क्यों ?

आज कल हिमाचल के निचले क्षेत्रों में सेब का तुड़ान जोरों पर है । अक्सर देखा जा रहा है कि बागवान भाई कच्चे माल का तुड़ान कर मंडियों में भेज रहे हैं, परिणामस्वरूप उन्हें अच्छे दाम नहीं मिल पा रहे ।
सेब की फसल की नीलामी के समय सेब की लालिमा फल की कीमत तय करने में एक महत्वपूर्ण कारक है । अतः जिन फलों में पूरी तरह रंग नहीं चढ़ा है, उन में इथरल की स्प्रे की जा सकती है । काफी वर्षों से प्रदेश के बागवान इस रसायन का उपयोग कर रहे हैं । लेकिन इसका स्प्रे करते समय कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखें । इथरल फल पकने की प्रक्रिया को तेज करता है जिससे फलों में एंथोसायनिन की मात्रा बढ़ जाती है और रंग लाल होने लगता है । इस रसायन को 400 मिलीलीटर प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए । रंग लाल होने की प्रकिया में तापमान व सूर्य के प्रकाश की अहम भूमिका रहती है । चूंकि इथरल से फल पकने की प्रक्रिया तेज होती है साथ ही ड्रॉपिंग की संभावनाएं भी बढ़ जाती है । इसलिए इसमें प्लेनोफिक्स 45 मिली लीटर 200 लीटर पानी में मिलाकर ही स्प्रे करें । ध्यान रहे प्लेनोफिक्स अधिक मात्रा में ना डालें क्योंकि इसकी अधिक मात्रा डालने से ड्रॉपिंग भी हो सकती है ।
कुछ बागवान भाई रंग जल्दी लाने के चक्कर में इथरल की मात्रा को बढ़ा देते हैं । यह बढ़ी हुई मात्रा फल को इतना जल्दी पका लेती है कि पेड़ों की सेहत पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की अधिक संभावना रहती है । फलों में जब 30-35% तक रंग आ गया हो तो उसके बाद ही इथरल का स्प्रे करें । ध्यान रहे जिन पेड़ों पर इसकी स्प्रे की गई हो उन फलों को कोल्ड स्टोर में भंडारित नहीं किया जा सकता है ।
सूर्य की रोशनी का सेब की लालगी बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहता है । इसलिए जहां तक संभव हो सूर्य की रोशनी को अधिक से अधिक फल पर पड़ने दें । इसके लिए समर प्रूनिंग एक लाज़वाब तकनीक है । इसके प्रयोग से एक तरफ जहां सर्दियों में बहुत ही कम प्रूनिंग की आवश्यकता रहेगी, दूसरी तरफ फलों में रंग भी अच्छा आएगा ।
एक बीमे पर एक ही फल रखें , यदि दो फल साथ जुड़े होंगे तो उनके जुड़ने वाली जगह पर भी लाल रंग नहीं आ पाता । इसलिए अगर आपको अपनी मेहनत का पूरा फल लेना है तो सब में पूरा रंग आने के बाद ही मंडियों में ले जाएं ।
तुड़ान के तुरंत बाद पेड़ों पर यूरिया की स्प्रे और जड़ों में खाद डालना न भूलें ।

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