कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां
कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो | इस कथनी को चरितार्थ कर दिखाया है करसोग क्षेत्र के पांगना गांव में रहने वाले डा जगदीश शर्मा ने | सेब की सघन बागवानी कर डा शर्मा कम क्षेत्र में अधिक पैदावार करके सेब की बागवानी को नये आयाम देने में जुट गये हैं | इन्होने सेब के क्लोनल रूट्स्टाक पर स्पर प्रकार की किस्में लगा कर, लगभग 60 टन प्रति हैक्टेयर उत्पादन का लक्ष्य रखा है | जब कि वर्तमान में हिमाचल में सेब की पैदावार 3-5 टन प्रति हैक्टेयर है |
दस गुना तक पैदावार बढ़ाने के उद्देश्य से डा शर्मा ने 2013 में उदयान विभाग हिमाचल प्रदेश से एक वर्ष की आयु के सेब के कुछ पौधे लिये थे | फ़रवरी 2013 में रोपित ये पौधे आज लगभग अढाई वर्ष के हो चुके हैं और कुछ पौधों में पुर्णतया थिनिंग के बावजूद भी इन पौधों ने इस वर्ष अच्छी फ़सल दी है | पौधों में फ़ल का आकार और रंग देखते ही बनता है |
Matribhumi Consultancy Services और Ambika Apple Nursery की तकनीकी देख-रेख और जगदीश जी के अथक प्रयासों और मेह्नत से यह संभव हो पाया है | “स्वदेशी पौधों में विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करके इन पौधों को तैयार किया गया है | इस तकनीक का फ़ायदा ले कर हमारे बागवान भी कम लागत में एक अच्छा बागीचा तैयार कर सकता है |”
बीजू मूलवृतों (Seedling Rootstock) पर लगाये गये पौधे अक्सर एक वर्ष छोड़ कर फ़सल देते हैं, जब कि क्लोनल रूट स्टाक पर तैयार किये गये पौधे लगातार फ़सल देने में सक्षम हैं | हमारे द्वारा दी जाने वाली खाद-पानी को ग्रहण करने की क्षमता क्लोनल रूट स्टाक में बीजू पौधों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है |
सघन खेती में लगाये गये इन पौधों की देख रेख करना बिल्कुल आसान है जब कि पुरानी तकनीक से लगाये कुछ पेड़ तो इतने बड़े हो जाते हैं कि इन पर प्रुनिंग, तुड़ान, और स्प्रे करना संभव ही नहीं हो पाता | क्लोनल मूलवृंत पर तैयार किये गये ये पौधे 3-4 वर्ष में भरपुर फ़सल देना शुरु कर देते हैं | जब कि बीजु मूलवृंत पर तैयार की गयी स्टैंडर की किस्में फ़सल देने में 10-12 साल लगा देती हैं |
सघन खेती में 250-300 पौधे तक प्रति बिघा क्षेत्र में लगाये जा सकतें है | इस तकनीक में पौधे लगाते समय कुछ विशेष बातों जैसे मूलवृंत का प्रकार, सेब की किस्म, सुरज की दिशा आदि का ध्यान रखना भी नितांत आवश्यक है | इन पौधों में की जाने वाली प्रुनिंग भी अलग प्रकार की है | अत: बागवान इस प्रकार की खेती करने से पहले तकनीकी जानकारी अवश्य हासिल कर लें |



