क्या आप भी इस समस्या से परेशान है ?
आज हम सेब के फल में लगने वाली ऐसी बीमारी के बारे में चर्चा करेंगे जिसकी वजह से प्रति वर्ष हिमाचल में 70 से 80 करोड़ रुपयों तक का नुकसान हो जाता है। शुरू में तो इस बीमारी का पता ही नहीं चलता लेकिन जैसे जैसे फल पकना आरम्भ होता है यह बीमारी अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर देती है , लेकिन उस वक्त कुछ भी नहीं किया जा सकता। असहाय बागवान फसल को बर्बाद होता देख व्यथित हो उठता है।
“जी हाँ हम बात कर रहें हैं कोर रॉट की”
डा. भूपेश गुप्ता के अनुसार इस बीमारी के प्रकोप से फल, बीज के पास से सड़ना शुरू होता है। इसके लिए उतरदायी फफूंद Alternaria alternata और Trichothecium Rossum के बीजाणु फूल खिलने की अवस्था में ही अन्दर चले जाते हैं और कुछ समय तक शांत रहते हैं। लेकिन जैसे-जैसे फल में शुगर की मात्रा बढ़ना शुरू होती है अर्थात जब फल पकना शुरू होता है, ये बीजाणु सक्रीय हो जातें है और फल, बीज की तरफ से बाहर की ओर सड़ना शुरू हो जाता है।
परिणामस्वरूप, फल में कडवापन आने और इसका भीतरी भाग सड़ जाने की प्रक्रिया आरम्भ होती है (फोटो)। इस बीमारी से ग्रसित फलों में रंग जल्दी आना शुरू हो जाता है। चूँकि इन फलों में फफूंद द्वारा जहरीले पदार्थ का स्त्राव होता है और ऐसे फलों को खाने पर हमारी सेहत को भी नुकसान हो सकता है।
गुलाबी कली या पंखुड़ीपात अवस्था पर यदि बारिश हो जाये तो इस बीमारी के पनपने की सम्भावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। इसकी रोकथाम हेतु मेन्कोजेब 600 ग्राम अथवा कार्बेन्डाजिम 100 ग्राम अथवा स्कोर 50 मिली लीटर प्रति 200 लीटर पानी में घोल कर पंखुड़ीपात अवस्था पर छिडकाव करें।
समय पर की गयी एक स्प्रे आपको भारी नुकसान से बचा सकती है।




