ऐसे करें रुट बोरर का इलाज

सेब के बागवानों को अक्सर रूट बोरर की समस्या परेशान करती रहती है। रूट बोरर नाम का यह कीड़ा पौधे की जड़ों को खा कर नष्ट कर जाता है। मादा द्वारा दिए गए अण्डों से लारवा अगस्त- सितम्बर तक निकल जाता है और यही उसको मारने का उपयुक्त समय रहता है | नौणी विश्वविद्यालय में हुए एक शोध के अनुसार Metarhizium anisopliae नामक फफूंद के प्रयोग से रूट बोरर की संख्या में 85% तक कमी पायी गयी है।
सोचने वाली बात है कि आखिरकार एक फफूंद, रूट बोरर को कैसे मार देती है …!!!
होता यूँ है कि जैसे ही हम फफूंद को पौधे के तौलिये में डालते हैं, तो यह कीड़े की त्वचा के संपर्क में आ जाती है और इस फफूंद के संक्रमण के कारण लारवा 2-4 दिनों में मर जाता है | इस फफूंद का इस्तेमाल करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है।
10 से 15 ग्राम प्रति पौधे के हिसाब से Metarhizium anisopliae के पाउडर का छिड़काव अगस्त महीने में तौलिये में किया जाना चाहिए। फिर तौलिये की गुड़ाई करके इसे अच्छे से मिटटी में मिला लें। कोशिश यह करें कि इसे 1 से 2 किलो कच्चे गोबर के साथ ही तौलिये में मिलाएं | मिलाने के पश्चात् तौलिये को हलकी घास आदि से ढक लें।
बरसात में पर्याप्त नमी के चलते यह फफूंद तेजी से फैलना शुरू कर देती है और धीरे-धीरे रूट बोरर के लारवा को ग्रसित कर देती है। कुछ दिनों बाद आप देखेंगे कि लारवा पर हरे रंग की फफूंद की परत चढ़ गयी है और वह मृत अवस्था में आपके बगीचे में पड़ा है। इतना ही नहीं , आप इस मरे हुए लारवा को पानी में डाल कर इसके Spores से बने घोल का भी इस्तेमाल कर सकते है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि इसके इस्तेमाल के बाद आप जड़ सड़न की रोकथाम के लिए किसी फफूंदनाशक का घोल तौलिये में न डाल दें। यदि आवश्यक हो तो फफूंदनाशक का घोल, Metarhizium anisopliae के इस्तेमाल से 20 से 25 दिन पहले डालें।
रूट बोरर को नियंत्रित करने की यह एक कारगार उपाय है। इसके अतिरिक्त लाईट ट्रैप का इस्तेमाल भी कीड़ों की संख्या को कम करने के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है। दिखाए गए फोटो के अनुसार आप लाईट ट्रैप का इस्तेमाल कर सकते हैं। एक बात का विशेष ध्यान रखें, कि जिस दिन बारिश हुई हो उससे अगले दिन, जब मौसम साफ़ हो तो लाईट ट्रैप का इस्तेमाल करें।
समय रहते रूट बोरर की रोकथाम आपके पौधों को नुकसान से बचा सकती है।

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