ऑनलाइन मार्केटिंग : प्रदेश में बागवानी का सुनहरा अध्याय

बारिश की रिमझिम बूंदो के बीच हिमाचल की मनोरम वादियों से रसीला सेब देश भर की मंडियों में जाने को तैयार है। प्रतिदिन लगभग 25 से 30 हज़ार सेब की पेटियां देश भर की मंडियों में पहुँच रही हैं। लेकिन विडंबना यह है कि लंबे समय से चलती आ रही विपणन प्रणाली के चलते बागवानों को उनकी मेहनत का पूरा फल नहीं मिल पाता है। एक आंकलन के अनुसार हिमाचल में आज भी बागवानों के लगभग 18 करोड़ रुपये आढ़तियों के पास फसें है। यह तो मात्र हिमाचल की ही बात कर रहा हूँ, देश भर में न जाने कितने बागवानों के खून पसीने की कमाई बिचौलियों के पास फंसी है इसका आंकलन करना मुश्किल है।
विपणन के समय छोटे बागवानों को बहुत सारी समस्याओं से जूझना पड़ता है और वर्ष भर मेहनत करने के पश्चात उसे निराशा ही हाथ लगती है। गुपचुप तरीके बिचौलियों द्वारा निकाली गयी कमीशन को कहीं भी नहीं दर्शाया जाता है और बागवान खुद को ठगा सा महसूस करता है। ऐसी निराशाजनक परिस्थियों के बीच फलों की इलेक्ट्रॉनिक नीलामी प्रणाली बागवानों के लिए उम्मीद की नई किरण ले कर आई है। इस व्यवस्था के चलते बागवान स्वेच्छा से घर बैठे अपनी फसल की नीलामी कर सकता है। हिमाचल में विश्व बैंक द्वारा पोषित हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास परियोजना के अंतर्गत NeML नामक कंपनी इस परियोजना के अंतर्गत बनाये गए क्लस्टर समूहों के फल उत्पादों को ऑनलाइन के माध्यम से बेच रहा है।
“2016-17 से मैं सेब ऑनलाइन बेच रहा हूँ और अधिकतम 15 दिनों के भीतर मेरे खाते में पैसे भी आ जाते हैं । यह एक सुरक्षित प्लेटफ़ार्म है जहां किसान के साथ धोखा धड़ी नहीं की जाती है” यह कहना है आनी क्षेत्र के बागवान प्रताप ठाकुर का।
इलेक्ट्रॉनिक नीलामी बागवानों के लिए एक पारदर्शी और सुरक्षित व्यवस्था है। गत वर्ष प्रदेश में लगभग 1.15 करोड़ रुपये के सेब एक कंपनी द्वारा ऑनलाइन के माध्यम से बेचे ग ।
होता यूं है कि देश भर से खरीददार एक कंपनी के साथ पंजीकृत होते हैं और उनकी बैंक गारंटी नीलामी करने वाली कंपनी के पास पहले से ही जमा होती है, जितनी बैंक गारंटी होती है उससे अधिक की राशि का माल खरीददार खरीद ही नहीं सकता। परिणामस्वरूप बागवान का पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहता है। इस प्लेटफॉर्म पर नीलामी करवाने वाली कंपनी के साथ बड़े कॉरपोरेट जगत की कंपनियां भी खरीददार के रूप में जुड़ी रहती हैं। जिससे एक खुली प्रतिस्पर्धा हेतू सबके लिए समान अवसर बने रहते हैं और फायदा बागवान को मिलता है। सबसे खूबसूरत बात तो यह है कि किसी को यह पता नहीं होता है कि देश के किसी कोने में बैठा खरीददार कौन है। फलस्वरूप व्यापारियों की आपसी साँठ गांठ की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं।
इस प्रणाली में बागवान और व्यापारी दोनों को पंजीकृत होना पड़ता है जिसके बाद उन्हें यूजर आई डी और पासवर्ड दिया जाता है। अगर किसी बागवान को अपना माल बेचना हो तो वह पोर्टल पर अपने उत्पाद की विस्तृत जानकारी डाल देता है। ख़रीददार, बागवान के इस संदेश को पोर्टल पर देख कर अपनी रूचि दिखाते हैं और नीलामी के लिए एक निश्चित समय तय किया जाता है। नीलामी शुरू होने से पहले बागवान अपने उत्पाद का न्यूनतम मूल्य तय करता है और फिर उसी मूल्य से बोली शुरू की जाती है। सबसे ऊपर लगाई गई बोली पर यदि बागवान राज़ी हो जाता है तो सौदा पक्का हो जाता है।
सौदा तय होने के बाद गंतव्य स्थान तक बागवान स्वयं भी माल को भेज सकता है अथवा ख़रीददार ,किसान द्वारा बताए गये स्थान से स्वयं भी माल उठा लेता है । बेचे गए इस फल उत्पाद का बीमा किसान सीधा बीमा कंपनियों से करवा सकते हैं। जिसका प्रीमियम आढ़ती द्वारा किये गए बीमा राशि से काफी कम होता है।
जैसे ही माल ख़रीददार के पास पंहुचता है, बागवान को उसकी राशि अदा कर दी जाती है। इस प्रणाली का खूबसूरत पहलू यह भी है कि ख़रीददार बाद में पैसा देने से आना कानी नहीं कर सकता, क्योंकि जिस समय सौदा पक्का हुआ होता है उसी वक़्त दोनों पक्षों के बीच एक इलेक्ट्रॉनिक करार हो जाता है। इसके अलावा ख़रीददार द्वारा रखी गयी बैंक गारंटी उसे कोई भी छल कपट नहीं करने देती । हालांकि प्रदेश सरकार द्वारा भी eNAM करके एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म बनाया गया है लेकिन अभी इसे पूरी तरह संचालित नहीं किया गया है।
वर्तमान परिस्थियों को देखते हुये फल मंडियों में भीड़ के चलते कोरोना महामारी के फैलने का डर भी बना रहता है लेकिन ऑनलाइन मार्केटिंग में इस खतरे से भी बचा जा सकता है।
अब समय आ गया है कि प्रदेश का बागवान विपणन प्रणाली के नए अवसरों को तलाश कर अपने उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त करे। ऑनलाइन मार्केटिंग करते वक़्त बागवानों को भी छल कपट करने से बचना होगा ताकि बागवानों और व्यापारियों के बीच विश्वास का माहौल बन सके। प्रदेश सरकार के द्वारा इस प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक नीलामी करने वाली कंपनियों को आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इस दिशा में बागवानों के हितों की सुरक्षा हेतु कड़े नियम बनाये जाएं ताकि बागवानों का भरोसा ई- नीलामी करने वाली कंपनियों पर सुदृढ़ हो सके। -[ शरद गुप्ता ]

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