कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां
शरद ऋतु के आगमन पर बागवान अपने बगीचों में घास कटाई, झाड़ियां साफ करना , पेड़ों पर चूना लगाना , यूरिया की स्प्रे इत्यादि कार्यों में जुट जाते हैं । हमारे बजुर्ग पौधे के तनो पर सर्दियों में चूना जरूर करते थे । यह मात्र बगीचा सुंदर दिखने के उद्देश्य से ही नहीं अपितु इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी होते थे । आज हम पेड़ों पर लगाये जाने वाले चूने के महत्व पर चर्चा करेंगे ।
सर्दियों में दिन में तेज़ धूप और रात को ठण्ड बढ़ना शुरू हो जाती है । पेड़ों पर पत्ते न होने की वजह से और सेब के पेड़ की चमड़ी का गहरा रंग होने के कारण पौधा दिन के समय अधिक गर्मी सोखता है । परिणामस्वरूप, कोशिकाओं में रस का प्रवाह शुरू हो जाता है । लेकिन रात के समय जैसे ही तापमान में गिरावट आती है तो यह रस जमना शुरू हो जाता है जिससे कोशिकाएं या तो फट जाती हैं या फिर क्षतिग्रस्त हो जाती हैं । हालाँकि इसका प्रमाण स्पष्ट रूप से पौधे की चमड़ी पर तुरंत तो नहीं देखा जा सकता है लेकिन लंबे समय तक ऐसी स्थिति होने पर तने में दरारें देखी जा सकती हैं ।
इस समस्या से निज़ाद पाने के लिये पेड़ों के तने पर चूने का लेप लगाना लाभदायक रहता है । चूने की सफेदी सूर्य की किरणों को परावर्तित कर देती हैं जिससे तने का तापमान अधिक नहीं बढ़ पाता है और पेड़ के तने को सूर्य की किरणों से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है । चूने के लेप को तने पर लगाने से बोरर आदि कीड़े भी पेड़ों पर आक्रमण नहीं कर पाते क्योंकि सफेदी की चमक से ये दूर रहना ही पसंद करते हैं । इसके अतिरिक्त यह लेप तने में फफूंद व माईट के अंडो को भी नष्ट करने में सहायक सिद्ध है ।
इस चूने का घोल बनाने के लिए चूना (2-3 किलो), अलसी का तेल (1 लीटर), नीला थोथा (500 ग्राम) 10 लीटर पानी में अच्छी तरह मिलाएं । इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अलसी के तेल को डालने से पहले एक बार उबाल कर ठंडा कर लें । इससे तेल की घुलनशीलता बढ़ जाती है । चूने को फोटो में दिखाए गए पेड़ के अनुसार तने से कुछ ऊपर तक लेपित करें और कम से कम 2 कोट करना सुनिश्चित करें |
सर्दियाँ शुरू होते ही पौधों में चूना लगाना आरंभ कर दें ताकि आप अपने पौधों को स्वस्थ बनाए रख सकें ।



