नई वैरायटी का फेर
आज कल हर कोई शख्स चाहता है कि उसके बच्चे का नाम सबसे अलग हो, ठीक उसी तर्ज पर कुछ लोग चाहते हैं कि उनके बागीचे में नई से नई वैराइटी हो । भले ही वैरायटी उनके बगीचे के लिए उपयुक्त हो अथवा नहीं ।
वैरायटी की इस अंधी दौड़ में हम हम यह भूलते जा रहे हैं कि हम सेब का पौधा लगा रहे हैं न कि टमाटर का, जो कुछ महीनों के बाद खत्म हो जाएगा ।
आज कल मार्केट में बहुत से सेब के हाई कलर स्ट्रेन आ गए हैं जो कि कम से मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों , जहां रंग नहीं आता है, के लिए उपयुक्त हैं । लेकिन अगर इन्हें अधिक ऊंचाई वाली जगहों पर लगाया जाएगा तो परिपक्व (Mature) होने तक इनका रंग काला पड़ जाता है ।
होता यूं है कि, जैसे जैसे हम ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ते जाते हैं सूर्य की पराबैंगनी किरणें (UV rays) सेब में Anthocyanin की मात्रा को बढ़ा देती है । सेब में जितना anthocyanin होगा, उतना ही उसका रंग लाल होगा । अतः सेब के परिपक्व होने तक High colour strain वाली किस्मों को अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लगाने पर सेब का रंग काला पड़ना शुरू हो जाता है । इसके विपरीत यदि सेब को पहले ही तोड़ दिया जाये, तो उसमें एक तो size नहीं बनता दूसरे स्वाद न होने की वजह से अच्छे दाम नहीं मिल पाते ।
कुछ लोग अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए बागवानों को भ्रमित कर रहें हैं । 3 साल पहले लगाए गए जिरोमाईन के पेड़ अब पुराने हो गए गए हैं । यही सोच कर कुछ बागवान भाई उन पर टॉप ग्राफ्टिंग कर रहे हैं । ज़रा सोचिये, अगर दो साल बाद कोई और वैरायटी आ गयी तो क्या आप अपने बगीचे में टॉप ग्राफ्टिंग ही करते रहेंगे ।
आप सब इस बात से भली भांति परिचित हैं कि बाजार में सेब उसकी लालगी (Red colour) और आकार (Shape & Size) के आधार पर ही बिकता है । आपसे कोई आढ़ती नहीं पूछेगा कि यह Z1 है या जीरोमाईन ।
अतः वैरायटी के फेर में न उलझ कर तकनीकी पर ध्यान दें ताकि सेब की लालगी से आप अच्छा मुनाफा अर्जित कर एक समझदार व सफल बागवान बन सकें ।



